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Thursday, 17 April 2014

नन्हें कदम:(view from my terrace)


रिमझिम टपकती बूंदों संग, थपथपाते नन्हें कदम ,
गर्मी की उमस को उड़ाता आया एक नया मौसम ,
बारिश की बूंदों संग ,नटखट बच्चों का शोर है ,
काले ,गुमसुम अंधेरे को तोड़ता ,मानो नया एक भोर है। 


खिलखिलाते ,कोमल बच्चों के ऊपर बरगद की फैली छाव है ,
गर्मी की थकान दूर करता ,बरगद मुस्कुराता ,पर मौन है। 
गर्मी की उमस हो या फिर मेघों का कठोर गर्जन,
उनकी सुरक्षा के लिए ,उसने हमेशा किया खुद को अर्पण। 


पत्तियों की घटा है,लेकिन, एक पक्की छत नहीं,
झिलमिलाते धूप और तेज बारिश, को वो रोक सकती नहीं। 
पर नटखट बच्चों को चाहिए नहीं एक पक्की छत ,
उन्हें तो लगी है ,खुले आस्मां तले, खेलने की लत। 


एक सरकारी विद्यालय के बगल में ,मैदान जहाँ खाली है ,
वहीं गर्व से फूलती ,बच्चों को देखती ,बरगद की हर डाली है। 
उसी विद्यालय के बगल में ,कुदरत का एक विद्यालय है,
खड़ा वर्षों से जिसमे ,बरगद जैसे हिमालय है। 


लड़खड़ाते ,कभी ये गिरते ,सम्भलते हैं ,नन्हें कदम ,
आने वाली मुश्किलों से बेपरवाह ,दौड़ते यें हरदम। 


 रिमझिम टपकती बूंदों संग, थपथपाते नन्हें कदम ,
गर्मी की उमस को उड़ाता आया एक नया मौसम ,
बारिश की बूंदों संग ,नटखट बच्चों का शोर है ,
काले ,गुमसुम अंधेरे को तोड़ता ,मानो नया एक भोर है। 

-निहारिका प्रसाद