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Monday, 13 April 2015

आज एक गुज़ारिश है..

घनी  पलकों के परदे में छुपी , मन के किसी कोने में ,
आज बंद लफ़्ज़ों  के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है। 

उस बेपरवाह पतंग की तरह , जिसकी डोर किसी ने न थामी हो ,
आज खुले आसमां में , लहलहाने की फ़रमाइश है। 

एक रुई के फाहे की तरह , बेटोक जो आसानी से हर जगह उड़ चलता है ,
आज उसी सरलता से ,एक अज्ञात लम्बी उड़ान भरने की ख्वाइश है।

टूटते तारे की तरह , सबको अचंभित करते हुए ,
आज स्थिर जगमगाते आकाश को , चीर देने की साजिश है।

छोटी छोटी ठंडी  बूंदों की तरह ,जो गर्मी की उमस से मुक्त  करती  हों  ,
आज मेरे थके मन में भी , ताज़ा ख्वाबों की बरसी एक बारिश है। 

उस बंद पिंजरे में कैद , फड़फड़ाते उस परिंदे की तरह ,
बरसों से जो उड़ने की आस में हो , आज मेरे मन ने मुझसे जैसे की एक सिफारिश है।


 घनी पलकों के परदे में छुपी , मन के किसी कोने में ,
आज बंद लफ़्ज़ों  के पीछे ,एक अनकही गुज़ारिश है।












           


                                                                                                              -  निहारिका प्रसाद